पहाड़ों पर बैठकर चाय की पहली सुड़की ही ली थी... तभी फोन बज उठा।
“यहाँ नेटवर्क आ रहा है!” मैंने सोचा।
उफ़्फ़! यहाँ नेटवर्क क्यों आ रहा है!
स्वाभाविक-सा ऑफिस का कॉल ही था। घरवालों और दोस्तों को पता था कि मैं बाहर हूँ और वे यह भी जानते हैं कि मेरे लिए पहाड़ शुरू से कितने ज़रूरी रहे हैं।
ऑफिस वालों को भी पता था कि मैं बाहर हूँ, सैंक्शन लीव पर हूँ। पर ये कमबख़्त फोन है ना, पीछा कहाँ छोड़ता है! और काम भी इतना ज़रूरी होता है कि चार दिन आप बाहर रहो, तो मानो प्रलय ही आ जाती है।
ख़ैर, फोन बजा है तो उठाना भी है। नेटवर्क ज़ोन में आते ही व्हाट्सऐप भी चल बैठा।
जहाँ एक ओर जूनियर किसी मैसेज पर ऑर्डर दे रही है, वहीं दूसरी ओर सीनियर किसी दूसरे ही मैसेज पर एक काम की रिक्वेस्ट कर रहा है।
मैसेज ऐसे कि कहीं बम ही फटा है और मैंने रिप्लाई नहीं किया, तो सब त्राहि-त्राहि हो जाएगा।
ख़ैर, एक घंटे बैठकर काम निपटाया। राहत की साँस ली कि मैंने बला आने से रोक ली है।
ओह! इन सबमें तो मैं भूल ही गई कि मैं छुट्टी पर पहाड़ आई हूँ।
उस एक घंटे में नदी के पानी की कलकल आवाज़ बंद हो गई थी। चिड़ियों की चहचहाहट को भी सुनने नहीं दिया। धूप तो छनकर कहीं और ही जा रही थी। और चाय... वो तो कब की जमकर बर्फ़ हो गई थी!
